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Tuesday, 18 March, 2008

निवेशकों के कान बुरी खबरों पर


डीएसपी मेरिल लिंच के एंड्रयू हॉलैंड का कहना है कि जब तक अमेरिका की स्थिति अच्छी नहीं हो जाती है तब तक विदेशी संस्थागत निवेशक (एफआईआई) बाजार में अपनी भागिदारी नहीं बढ़ाएंगे।


उन्होंने कहा कि यह कहना मुश्किल है किस वित्तीय संस्थान की स्थिति खराब होगी। लेकिन उन्हें उम्मीद है कि जीडीपी की दर इस साल 8-9 फीसदी रहेगी।



एंड्रयू हॉलैंड ने ‘सीएनबीसी-टीवी18’ से खास बातचीत की:-


सवाल: बाजार की स्थिति काफी खराब हो चुकी है। वैश्विक नजरिए को ध्यान में रखें तो अभी भारत की स्थिति कैसी है?


जवाब: सबसे पहले यह देखना होगा कि फेडरल रिजर्व आज ब्याज दर में कितनी कटौती करता है। लेकिन ब्याज दर में जो कटौती हो रही है उसका प्रभाव पूरी तरह अर्थव्यवस्था में आने में समय लगेगा। इसलिए अभी सब इस ओर देख रहे हैं कि किधर से नई समस्या आ रही है। इन्हीं कारणों से हम बाजार में इस स्थिति में हैं।



यह सही है कि बेयर स्टंर्स की समस्या थोड़ी गहरी थी। इसने वित्तीय बाजार की खस्ता हालत को उजागर किया। हालांकि इससे बचने के लिए जेपी मॉर्गन और फेडरल रिजर्व ने कदम भी उठाए। अब सभी की नजर इस पर है कि इस तरह की अगली समस्या किस ओर से आने वाली है। इन सभी कारणों से बाजार में इस तरह की स्थिति हो गई है।सवाल: इस तरह की समस्या अगले कुछ हफ्तों में भी आ सकती है? ऐसा लग रहा है कि लीमन ब्रदर्स भी इसका शिकार हो सकता है। ऐसी उम्मीद की जा रही है कि और भी निवेश बैंक दिवालियेपन की कगार पर पहुंच सकते हैं?जवाब: इस समस्या के बारे में कोई बता नहीं सकता। आप इसकी उम्मीद कर सकते हैं या अटकलें लगा सकते हैं। लेकिन जब तक इन कम्पनियों की तरफ से इस तरह की खबरें नहीं आती है कुछ भी कहना मुश्किल है।



मेरे हिसाब से अभी जो समस्या है वो सामान्य मंदी से अलग है, जहां आप पता कर सकते हैं कि समस्या कहां है। लेकिन फिलहाल की समस्या चारों तरफ फैली हुई है। इसलिए वित्तीय संस्थानों की समस्या का असर अमेरिका के अलावा एशिया और यूरोप सभी जगह हो रहा है। ऐसे में आप नहीं समझ सकते की समस्या कहां है।


Saturday, 15 March, 2008

सोमवार के लिए बाजारों के लिए रुझान अच्छे नहीं


एक के बाद एक हचकोले खा रहे शेयर बाजारों की स्थिति बेहद ही नाजुक है। घरेलू ही नहीं पूरी दुनिया

के बाजारों में इन दिनों अनिश्चितता का माहौल है और इसके पीछे एक ही वजह है वो है दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था में मंदी का संकट।दुनिया के बड़े-बड़े अर्थशास्त्रियों से लेकर खुद अमेरिकी राष्ट्रपति तक ने माना है कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था मंदी की चपेट में है। अमेरिका के केन्द्रीय बैंक फेडरल रिजर्व द्वारा आठ हजार अरब रुपए की सहायता राशि की घोषणा के बाद भी स्थिति सुधर नहीं पा रही है। ऐसे में अंदाजा लगाया जा सकता है कि संकट कितना गहरा है।

फेडरल रिजर्व एक के बाद ब्याज दर में कटौती करता जा रहा है लेकिन इन सबके बावजूद संकट कम होता नहीं दिख रहा है और जब संकट दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था पर हो तो इससे बाकी देश अछूते नहीं रह सकते।फेड द्वारा ब्याज दर में लगातार कटौती से डॉलर की बाढ़ सी आ गई है। हर देश की मुद्रा डॉलर की तुलना में मजबूत होती जा रही है। जापानी मुद्रा येन तो रिकॉर्ड मजबूती दिखा रहा है और अगर येन की तेजी जारी रही तो इसका असर एशिया के सभी बाजारों पर पड़ सकता है।

भारतीय बाजार भी इस वैश्विक संकट की जाल में फंसे हुए हैं। यहां भी औद्यौगिक विकास की दर में गिरावट देखी जा रही है। ऊपर से महंगाई भी बढ़ती जा रही है जिससे ब्याज दर में कटौती के आसार भी कम हो गए हैं।इस हफ्ते भारतीय बाजारों में काफी उठापटक देखी गई। हालांकि आखिरी कारोबारी दिन में आअई अच्छी तेजी से बाजार थोड़ा सम्भला। मुम्बई शेयर बाजार का संवेदी सूचकांक यानी सेंसेक्स पूरे हफ्ते में एक फीसदी कमजोर हुआ जबकि राष्ट्रीय शेयर बाजार का सूचकांक निफ्टी में पूरे हफ्ते में मामूली कमजोरी दर्ज हुई।

पिछले हफ्ते भारतीय बाजारों ने भारी गिरावट दिखाई थी। भारतीय बाजार हर बड़ी गिरावट के बाद वापसी करने की कोशिश करता है और फिर से वापस निचले स्तर पर पहुंच जाता है।घरेलू बाजार गिरावट के मामले में दुनिया के सभी बाजारों को पीछे छोड़ देता है। जनवरी से अब तक सेंसेक्स तीन बार 15 हजार के पास पहुंच चुका है और हर बार यहां से वापसी करता है लेकिन फिर मुनाफावसूली के जाल में फंस जाता है।

समस्या यह है कि बाजारों में नए निवेश बिल्कुल हीं नहीं आ रहे हैं। खुदरा निवेशकों के पास नकद होने के बावजूद वो इस दुविधा में हैं कि बाजार कहां तक टूटेगा और कब तक यह मंदी जारी रहेगी जबकि बहुत सारे खुदरा निवेशकों के पैसे काफी ऊंचे स्तर पर फंसे हुए हैं वो या तो बाजार के ऊपर जाने का इंतजार कर रहे हैं या घाटे में अपने शेयर बेच रहे हैं। उधर संस्थागत निवेशक खरीदी से ज्यादा मुनाफावसूली पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं।बाजार में ऐसे माहौल कुछ महीने और रह सकते हैं। जब तक अमेरिका में स्थिति बेहतर नहीं होती इस तरह की अस्थिरता जारी रहेगी। ऐसे माहौल में निवेशकों को यह चुनाव करना होगा कि कौन से स्टॉक अपने उच्चतम स्तर से काफी नीचे आ चुके हैं, साथ ही उस कम्पनी के आय के अच्छे आसार हों। निवेश का नजरिया लम्बी अवधि का ही रखना होगा।अगले हफ्ते दुनिया भर की नजर फेड की मंगलवार को होने वाली बैठक पर होगी। अगर यहां से कुछ घोषणाएं होती है तो इसका असर बाजारों पर दिखेगा।

वैसे सोमवार के लिए बाजारों के लिए रुझान अच्छे नहीं है क्योंकि जिस तरह की कमजोरी हफ्ते के आखिरी दिन अमेरिकी बाजारों ने दिखाई है इसका दबाव सोमवार को खुलने वाले एशियाई बाजारों पर निश्चित रुप से दिखाई देगा।

Wednesday, 27 February, 2008

मध्यम अवधि में अस्थिर रहेगा बाजार

स्टैंडर्ड चार्टर्ड बैंक के इक्विटी उपाध्यक्ष अजय बोडके को उम्मीद है कि मध्यम अवधि में बाजार अस्थिर रहेगा। इन्हें विश्वास है कि वित्त वर्ष 2008 में आय में वृद्धि की दर 22-24 फीसदी रहेगी और वित्त वर्ष 2009 में आय वृद्धि दर 15-16 फीसदी रहेगी।

बाजार को बजट में मानक कटौती सीमा में कमी की उम्मीद है। वस्तुओं के आयात पर लगने वाले शुल्कों में कटौती हो सकती है। बाजार यह भी उम्मीद कर रहा है कि व्यावसायिक अधिभार और प्रत्यक्ष कर में कटौती की जा सकती है।

Thursday, 14 February, 2008

बाजार के लिए वैश्विक संकेत बेहद अहम

आज के कारोबार में स्थिति थोड़ी बेहतर होती दिखाई दी। लेकिन अभी भी जानकारों का कहना है कि बाजार की सही दिशा बजट के बाद ही पता चल पाएगी।आज के कारोबार की सबसे अच्छी बात यह थी कि विदेशी संस्थागत निवेशकों की तरफ से खरीदारी देखी गई। खरीदारी और बिकवाली का अनुपात 2:1 के करीब होगा जबकि कल के कारोबार में यह 1:1 के अनुपात में था। कल के कारोबार के आखिरी सत्र में थोड़ी खरीदारी की झलक देखने को मिली थी।

लेकिन घरेलू संस्थागत निवेशकों की तरफ से ऊपरी स्तरों पर थोड़ी मुनाफावसूली देखी गई।म्युच्युअल फंड ने जनवरी 22 की गिरावट से अब तक 6,500 करोड़ रुपए की खरीदारी की है। लेकिन ऊपरी स्तरों पर जहां भी उन्हें लगता है यह मुनाफावसूली करने से भी नहीं चूकते।
ज्यादातर एचएनआई (हाई नेटवर्थ इंवेस्टर) यानी बड़ी पूंजी वाले निवेशक और खुदरा निवेशक बाजार से दूर हैं। वे बाजार में प्रवेश करने से घबरा रहे हैं। वे स्थिति सामान्य होने का इंतजार कर रहे हैं।ट्रेडर यूरोप से मिलने वाले संकेतों की तरफ देख रहे हैं। इसलिए बजट तक अंतर्राष्ट्रीय संकेत काफी अहम होंगे। आज रात बेन बर्नांके की सीनेट कमिटी के साथ बैठक होने वाली है, यहां से बाजार को बहुत ही महत्वपूर्ण संकेत मिल सकते हैं।
बाजार में थोड़ी सकारात्मकता तो आई है लेकिन अभी भी सावधानी बरतने की जरुरत है। निफ्टी के लिए 5300-5400 का स्तर बेहद अहम है। यह प्रतिरोधक स्तर है।

Wednesday, 13 February, 2008

सेंसेक्स में 12,700 का स्तर भी सम्भव

सेंसेक्स 14,700 और निफ्टी 4,200 के स्तर को छू सकता है। अगर बाजार में बड़ी मंदी का दौर रहता है तो सेंसेक्स 12,500 से 12,700 के स्तर पर भी पहुंच सकता है। निफ्टी में यह गिरावट 3,700-3,800 के स्तर तक जा सकती

बाजार में अगर कम मंदी रहती है तो सेंसेक्स 14,700 और निफ्टी 4,200 के स्तर को छू सकता है। लेकिन अगर बड़ी मंदी के आसार दिखते हैं तो ऐसे में सेंसेक्स 12,500 से 12,700 के स्तर पर जा सकता है और निफ्टी 3,700-3,800 के स्तर को छू सकता है।

सवाल: ताजा आंकड़े हाल के स्तर से गिरावट के संकेत ज्यादा दे रहे हैं या सुधार के संकेत?जवाब: कल तक भारतीय बाजार मंदी के संकेत की बाट जोह रहे थे। कल बाजार जनवरी माह के सबसे निचले स्तर से भी नीचे बंद हुआ। इस गिरावट के दौर में हमने सेंसेक्स को 19,000 तक के उच्चतम स्तर तक जाते देखा है। यानी एक उच्चतम स्तर और न्यूनतम स्तर का ढांचा बन गया है।

Tuesday, 5 February, 2008

बाजार में तरलता लौट रही है

कोटक सिक्योरिटीज के पोर्टफोलियो मैनेजमेंट सर्विसेस के उपाध्यक्ष शशांक खड़े ने कहा कि सेकेंडरी मार्केट में तरलता फिर से वापस आने की कोशिश कर रही है। उनका कहना है कि बजट से पहले अगर बाजार में तेजी आती है तो निवेशकों को इसे मुनाफावसूली के तौर पर लेना चाहिए।

बाजार में तरलता की कमी शशांक खड़े ने ‘सीएनबीसी-टीवी18’ से खास बातचीत की:सवाल: बजट तक आप बाजार को कहां जाते देखते हैं? बाजार एक सीमित दायरे में घूमता नजर आएगा या इसमें अच्छी तेजी देखने को मिल सकती है?
शेयर बाजार इस साल भी उछलेंगे: कोटक जवाब: मेरा यही मानना है कि निवेशकों के पैसे रिलायंस पावर के आईपीओ में फंसे हुए थे। लेकिन अब यह पैसे सेकेंडरी मार्केट का रुख कर सकते है। निवेशक अब मौके की तलाश कर रहे हैं विशेषकर उन स्टॉक में जो अपनी ऊंचाइयों से काफी दूर है। निवेशक निवेश के लिए अच्छे स्टॉक की तलाश कर रहे हैं।
लेकिन अगर आप आय के नजरिए से देखेंगे तो उत्पादन में धीमापन देखने को मिल सकता है। कई सारी कम्पनियां अपने ऑर्डर को अंतिम रुप देने में देरी कर रही हैं। अगर यह दौर जारी रहता है तो निर्माण क्षेत्र और पूंजीगत वस्तु वाली क्षेत्र की कम्पनियों के ऑर्डर बुक में धीमापन आ सकता है और इनके मूल्यांकन में थोड़ा हल्कापन देखने को मिल सकता है।