Saturday, 15 March, 2008

सोमवार के लिए बाजारों के लिए रुझान अच्छे नहीं


एक के बाद एक हचकोले खा रहे शेयर बाजारों की स्थिति बेहद ही नाजुक है। घरेलू ही नहीं पूरी दुनिया

के बाजारों में इन दिनों अनिश्चितता का माहौल है और इसके पीछे एक ही वजह है वो है दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था में मंदी का संकट।दुनिया के बड़े-बड़े अर्थशास्त्रियों से लेकर खुद अमेरिकी राष्ट्रपति तक ने माना है कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था मंदी की चपेट में है। अमेरिका के केन्द्रीय बैंक फेडरल रिजर्व द्वारा आठ हजार अरब रुपए की सहायता राशि की घोषणा के बाद भी स्थिति सुधर नहीं पा रही है। ऐसे में अंदाजा लगाया जा सकता है कि संकट कितना गहरा है।

फेडरल रिजर्व एक के बाद ब्याज दर में कटौती करता जा रहा है लेकिन इन सबके बावजूद संकट कम होता नहीं दिख रहा है और जब संकट दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था पर हो तो इससे बाकी देश अछूते नहीं रह सकते।फेड द्वारा ब्याज दर में लगातार कटौती से डॉलर की बाढ़ सी आ गई है। हर देश की मुद्रा डॉलर की तुलना में मजबूत होती जा रही है। जापानी मुद्रा येन तो रिकॉर्ड मजबूती दिखा रहा है और अगर येन की तेजी जारी रही तो इसका असर एशिया के सभी बाजारों पर पड़ सकता है।

भारतीय बाजार भी इस वैश्विक संकट की जाल में फंसे हुए हैं। यहां भी औद्यौगिक विकास की दर में गिरावट देखी जा रही है। ऊपर से महंगाई भी बढ़ती जा रही है जिससे ब्याज दर में कटौती के आसार भी कम हो गए हैं।इस हफ्ते भारतीय बाजारों में काफी उठापटक देखी गई। हालांकि आखिरी कारोबारी दिन में आअई अच्छी तेजी से बाजार थोड़ा सम्भला। मुम्बई शेयर बाजार का संवेदी सूचकांक यानी सेंसेक्स पूरे हफ्ते में एक फीसदी कमजोर हुआ जबकि राष्ट्रीय शेयर बाजार का सूचकांक निफ्टी में पूरे हफ्ते में मामूली कमजोरी दर्ज हुई।

पिछले हफ्ते भारतीय बाजारों ने भारी गिरावट दिखाई थी। भारतीय बाजार हर बड़ी गिरावट के बाद वापसी करने की कोशिश करता है और फिर से वापस निचले स्तर पर पहुंच जाता है।घरेलू बाजार गिरावट के मामले में दुनिया के सभी बाजारों को पीछे छोड़ देता है। जनवरी से अब तक सेंसेक्स तीन बार 15 हजार के पास पहुंच चुका है और हर बार यहां से वापसी करता है लेकिन फिर मुनाफावसूली के जाल में फंस जाता है।

समस्या यह है कि बाजारों में नए निवेश बिल्कुल हीं नहीं आ रहे हैं। खुदरा निवेशकों के पास नकद होने के बावजूद वो इस दुविधा में हैं कि बाजार कहां तक टूटेगा और कब तक यह मंदी जारी रहेगी जबकि बहुत सारे खुदरा निवेशकों के पैसे काफी ऊंचे स्तर पर फंसे हुए हैं वो या तो बाजार के ऊपर जाने का इंतजार कर रहे हैं या घाटे में अपने शेयर बेच रहे हैं। उधर संस्थागत निवेशक खरीदी से ज्यादा मुनाफावसूली पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं।बाजार में ऐसे माहौल कुछ महीने और रह सकते हैं। जब तक अमेरिका में स्थिति बेहतर नहीं होती इस तरह की अस्थिरता जारी रहेगी। ऐसे माहौल में निवेशकों को यह चुनाव करना होगा कि कौन से स्टॉक अपने उच्चतम स्तर से काफी नीचे आ चुके हैं, साथ ही उस कम्पनी के आय के अच्छे आसार हों। निवेश का नजरिया लम्बी अवधि का ही रखना होगा।अगले हफ्ते दुनिया भर की नजर फेड की मंगलवार को होने वाली बैठक पर होगी। अगर यहां से कुछ घोषणाएं होती है तो इसका असर बाजारों पर दिखेगा।

वैसे सोमवार के लिए बाजारों के लिए रुझान अच्छे नहीं है क्योंकि जिस तरह की कमजोरी हफ्ते के आखिरी दिन अमेरिकी बाजारों ने दिखाई है इसका दबाव सोमवार को खुलने वाले एशियाई बाजारों पर निश्चित रुप से दिखाई देगा।

0 comments: