सिंगापुर। मुद्रास्फीति से निपटने के लिए ऊंची ब्याज दरों और व्यापार घाटे के चलते वर्ष 2008..09 में भारत में वृद्धि दर 8.1 प्रतिशत रहने का अनुमान है जो चालू वित्तीय वर्ष के दौरान 8.7 फीसदी रहने की संभावना है।
हांगकांग में सिटीग्रुप के मुख्य अर्थशास्त्र्री यिपिंग हुआंग ने कहा कि तेल और खाद्य पदार्थों की कीमतों से मुद्रास्फीति की बढती दर एशियाई देशों के लिए चिंता की मुख्य वजह है।उन्होंने कहा “हालांकि अधिकतर एशियाई देशों की अर्थव्यवस्था में शुरुआती दौर में मंदी रही और हाल में अमेरिकी अर्थव्यवस्था में आई तेजी से गिरावट सबसे बडी चिंता है।”
एक सर्वे के मुताबिक अमेरिका और यूरोप की ओर से मांग में कमी की वजह से इस वर्ष एशिया की आर्थिक वृद्धि दर कमजोर पड गयी है और इस क्षेत्र में निर्यात पर खासा असर देखा गया।
चीन की अर्थव्यवस्था लगातार छठे साल भी दो अंकों की वृद्धि दर के आंकडे पर बरकरार है लेकिन प्रसार की गति धीमी पडने की वजह से क्षेत्र से वस्तुओं के निर्यात में कमी आयी है जिन्हें अमेरिका और यूरोप भेजा जाना था।पेइचिंग के अर्थशास्त्री लिन सोंग ली ने कहा “सबसे बडी चिंता इस बात की है कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था जापान और यूरोप को बर्बाद कर देगी और इस तरह चीन के निर्यात क्षेत्र पर भी असर पड़ॆगा।”
जापान को छोडकर एशिया प्रशांत के 12 देशों की अर्थव्यवस्था के सर्वेक्षण में 11 देशों के सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर में गत दिसंबर में हुए ऐसे सर्वे के मुकाबले कमी देखी गयी। सिर्फ ताईवान द्वीप में वृद्धि दर में कोई बदलाव नहीं दिखा।इस बीच अर्थशास्त्रियों ने पूरे क्षेत्र में इस वर्ष के लिए मुद्रास्फीति के कयास लगाने शुरु कर दिए हैं।माना जा रहा है कि 2008 में चीन की आर्थिक वृद्धि दर पिछले वर्ष 11.4 फीसदी के मुकाबले 10 प्रतिशत तक खिसक कर चली जाएगी जो एक दशक में पहली गिरावट है।
दक्षिण कोरिया की अर्थव्यवस्था 2008 में तीन वर्ष के सबसे निचले स्तर 4.6 प्रतिशत तक पहुंचने का अनुमान है जबकि सिंगापुर में यह दर पिछले वर्ष के 7.7 के मुकाबले 5.6 फीसदी तक गिर सकती है।थाइलैंड की वृद्धि दर 4.6 फीसदी तक पहुंच सकती है लेकिन दिसंबर में हुए शांतिपूर्ण चुनाव के बाद लोकतंत्र की बहाली से अर्थव्यवस्था को काफी बल मिला है।
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