Monday, 4 February, 2008

महंगाई दर तो घटी लेकिन महंगाई नहीं

मुद्रास्फीति पर अंकुश लगाने के सरकार के प्रयासों की कामयाबी का अर्थ यह नहीं है कि इससे ‘आम आदमी’ की जिंदगी आसान हो गई है और उनको रोजमर्रा की चीजें सस्ती मिलने लगी हैं।
उद्योग मंडल एसोचैम के एक विश्लेषण से कहानी उल्टी नजर आती है। एसोचैम के अनुसार जनवरी 2003 से जनवरी 2008 के बीच आम आदमी की जरूरत की सात चीजों कॉफी, दालें, गेंहू, मसाले, फल, सब्जी, मांस-मछली, अंडे और दूध के दामों में क्रमशः 82, 34, 24, 22, 21, 19 और 18 प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि हुई और चीजें आम लोगों की पहुंच से बाहर हो गईं।

महंगाई दर 0.10 प्रतिशत बड़ी

इस अवधि में जनवरी 2003 में थोक मूल्य सूचकांक पर आधारित मुद्रा स्फीति की वृद्धि दर 3।41 प्रतिशत, जनवरी 2004 में 5.46 प्रतिशत, जनवरी 2005 में 6.42 प्रतिशत, जनवरी 2006 में 4.43 प्रतिशत, जनवरी 2007 में 5.42 प्रतिशत और जनवरी 2008 में चार प्रतिशत से कम पर आ गई है।

एसोचैम के अध्यक्ष वी।एन.धूत ने आवश्यक वस्तुओं की कीमतों और मुद्रास्फीति के बीच संबंध की यह अध्ययन रिपोर्ट जारी करते हुए एक बयान में कहा है कि आवश्यक वस्तुओं की मंहगाई के बावजूद मुद्रास्फीति में यह कमी इसलिए दिखी क्योंकि मुद्रास्फीति की गणना विधि में अन्य वर्गों की चीजों की कीमतों का बड़ा स्थान है।

एसोचैम के अध्यक्ष ने आवश्यक वस्तुओं की कीमतों को लोगों की पहुंच में बनाए रखने के लिए दो तरफा रणनीति अपनाने का सुझाव दिया है। धूत ने कहा है कि एक तरह इन वस्तुओं का उत्पादन और उत्पादकता बढ़ाने की योजना बनाई जानी चाहिए तथा अंतर्राष्ट्रीय वायदा बाजार में सौदे कर के दाम बढ़ने की प्रत्याशाओं पर लगाम लगाना चाहिए।

नौ फीसदी जीडीपी वृद्धि का भरोसा: वित्तमंत्री

एसोचैम के अध्ययन के अनुसार जनवरी 2003 से 2005 के बीच आम लोगों की जरूरत की अन्य चीजों के दामों में भी 34 प्रतिशत की वृद्धि हुई।

उद्योग मंडल के अनुसार काफी की घरेलू और निर्यात मांग बढ़ने के कारण इसके दामों में उछाल आया। इसी प्रकार दालों का उत्पादन मांग के अनुरूप न बढ़ने के कारण इसके बाजार चटकता रहा। दाल की खपत सालाना दो करोड़ टन से ऊपर है जबकि उत्पादन 1।35 करोड़ टन ही है।

दुनिया का प्रमुख दुग्ध उत्पादक देश होते हुए भी देश में दूध के दामों में तेजी बनी हुई है। हाल के दिनों में भी इसके दामों में सात प्रतिशत की तेजी दर्ज की गई है।

घरेलू स्टॉक कम होने और अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कीमतें चढ़ने से गेहूं पर भी दबाव है।

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